“क्लासिकल बंजारा ही शोषक बन गया है”

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“क्लासिकल बंजारा ही शोषक बन गया है”
अशोक भाई ,

जय सेवालाल

आपकी हिम्मत की दाद देता हूँ । बहुत कम लोग विचारोको खुलेपण से लिखते हैं । आपके संपूर्ण लेख का अवलोकन करने पर लिखने का साहस जूटा पाया हूँ। वर्तमान गोर समाज की वैचारिक गलियां इन दिनों बड़े जोशीले माहोल से चर्चित है। इसे सकारात्मकता से लेते हुए आजतक हम सामान्य वाचक हमारा वैचारिक ज्ञान वृद्धिंगत कर रहे है।

लेकिन इस दौरान एक बात जरूर नजर आती है की घृणा बेचने का बाजार दिनोदिन फलफूल रहा है। समाज को परिवर्तन की लालच देकर कुछ ठेकेदार भ्रमित कर रहे है । हर समाज , जाती , वर्ग की अपनी जीवनशैली , अस्मिता, श्रद्धा, संतपुरुष होते है। उनकी मान्यता को नकारना गलत है। रही बात पुरोगामीत्व पे दावा ठोकने वाले बंधुओ की तो मेरा ये मानना है की फुले शाहू आंबेडकरजी महान है । पर सिर्फ उनका नाम लेके पुरोगामीत्व सिद्ध करने की बंजारा को जरूरत नही. कुछ लोग पेहराव की तरह उनका नाम लिपटे हुये घूमते फिरते है। गोरबंजारा जैसा परिवर्तनवादी पुरोगामी समाज कोई नही. अपने पुरोगामीत्व को ढूंढने या उजागर करने मे हमारा क्लासिकल गोर अपयशी हुआ है ।और यह शतप्रतिशत सत्य है। विधवा विवाह किसी और से हमे सीखने की जरूरत नही पडी ।  सतीप्रथामे हमारी बंजारा स्त्री बली नही चढ़ी। पुरोगामीत्व  हमसे लोग सिखते थे ऐसा कहने मे भला क्या गैर है। जब तक हमारे क्लासिकल लोग अपनी संस्कृती का रचनात्मक आदर्श पुरजोर तरीकेसे उजागर नही करते तब तक उन्हें बोलने का अधिकार नही है।

फिलहाल वैचारिक भ्रम, घृणा फैलाने मे हमारा क्लासिकल गोर अग्रणी है । यह एकतरह का आक्रमण है उन टांडा वासियो पर जिसका अपना खून किसी गैर सामाजिक संघटन की शक्ति बढ़ाने मे खर्च हो रहा है।  जिस क्लासिकल वर्ग को अपनी घर की दीवार मजबूती से खड़ी करनी चाहिए वो शहरी नोकरदार गोर  किसी और के कहने से सिर्फ घृणा बेचने मे व्यस्त है। किसी एक धर्म के कर्मकांड एवम् शोषण का बहाना लेकर घृणा परोसना । विकास के रचनात्मक कार्यो को छोड़ सिर्फ विरोध का महिमागान करना । इससे टांडा आहत और पीड़ा मे है। खुद के समाज, संस्कृती , त्योहारोका उदात्तीकरण किये बिना स्वाभिमान या परिवर्तन की अपेक्षा करना गलत है।इसलिए अब विचारो की फाइट करनी पड़ेगी। रचनात्मक कार्य करने वालो का समाज हमेशा साथ देता है। टांडा सदियों से अपनी अस्तित्व की लढाई मे जीतता आया है। न जाने कितने परिवर्तन हुए लेकिन अपनी संस्कृती को टांडा संजोये हुआ है। लेकिन भौतिकवादी नोकरदार गोर अब क्लासिकल बनके टांडा जीवनशैली पर आघात कर रहा है। पहले तो इस क्लासिकल गोर को गोर होने का गर्व करना मानना चाहिए। गोरमाटीयों से प्रित करनी होगी। हम क्लासिकल सुधरे हुए है आप टांडा वासियों को सुधारने चले है इस अहम भावना से काम नही चलेगा।
अशोकजी आपने बडा अच्छा चिंतन लिखा । धन्यवाद ।

–  प्रा रवींद्र बं राठोड

9028677020
“सौजन्य”

गोर कैलास डी राठोड

 

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