“गोरमाटीर लेंगी महत्व”चावट लेंगी-एक शास्त्रीय कारण’

“वाते मुंगा मोलारी”

                     भीमणीपुत्र 

” चावट लेंगी”-एक शास्त्रीय कारण”..!

An Aboriginal Face of Gormatee

       

    लेंगी कतो मुक्त काव्य छ. लिंग >लैंगिक >लेंगी, हानू लेंगी ये शब्देरो उत्पतीरो प्रवास छ. ई श्लील छ तो अश्लील बी छ. येनं चावट/ भांड लेंगी बो कचं. आदिम काळेम इ चावट लेंगी समाज साक्षेप रं.अन ऊ काळेर गरज र. येर लार शास्त्रीय  कारण छ.

          लैंगिक उत्तेजन निर्माण करेसारु ये ‘ चावट लेंगी’ बोलेर प्रथा आदिम काळेमं गोर धाटीमं रुढ वेमेली छ. ये संदर्भेमं डाॅ.कसबे ये अभ्यासकेर मत आतं धेनेम लेणो इ गरजेर छ. ओनेर केणो छ क, ” हे तथाकथित  भारतीय विचारवंत आदिम माणसाच्या आचारा मागील उधीष्ट निट समजून घेत नाहीत, हीच त्या मागील आडचण आहे. कोसंबीनी होळी या सणाचे उदाहरण दिले आहे.जो होलिकोत्सव कायद्याच्या दृष्टीने घृणास्पद,  बेबंद आणि अश्लील मानला जातो, तो अतिप्राचीन रानटी युगात उगम पावल्याचे दिसते..; पण ज्या काळी अन्न गोळा करणे हा सामान्य जीवनक्रम होता, अन्नाचा पुरवठा अपुरा आणि बेभरवशाचा होता त्य काळात प्रजोत्पादनाला उद्युत करण्यासाठी बरीच बाहय चेतना निर्माण करणे आवश्यक होते, त्या काळी वंश जगविण्या साठी अश्लीलता अनिवार्य होती” 

          डाॅ.कसबेर ये विचारे परती इ सिद्ध वचं क, गोर धाटी माइर रुढ चावट लेंगी ये प्रथानं शास्त्रीय कारण छ.काम वासना जागृत करेवासू आदिम काळेमं चावटपणा करणू इ गरजेर रं, ओज काळे माइर इ परंपरागत ‘चावट लेंगी’ इ एक बोलकी प्रथा छ. 

          जेर घरं धुंड रचं ; आसे धुंडेवाळेर घरं तांडे माइर गेरणी रातभर ‘ सुंवाळी’ तळू करचं अन चावट लेंगी बोलू करचं. 
  ‘सीपाइडा लाल पलंग रोळा लं

                          आसी वकतेपं

सीपाइडा लाल बीडलो मंगा लं

                          आसी वकतेपं’
ये सीपाइ! मदमस्त वातावरण छ. आसे धुंदं वकतेपं मार सोबत पलंग रोळा लं…तु पानेर बीडो बी मंगा लं..मनं मनसोक्त लुट आसी वकतेपं..!

केयेर मतलब आतराज छ क, गोरमाटी माइर धुंड प्रथाअन ये निमतेती लेंगी नामेरो इ ‘ मुक्त काव्य’ बोलेर इ प्रथा गोरमाटीरे आदिम जीवने माइर ” मुक्त स्वैराचारेर” इ एक अवशेष छ.येरो बी पुरावा लेंगीम जागोजाग विकरारे छ.

उद:-
‘ टाळ टाळ गेरीया तोपर छोडीया..!

छोरा काढये गेरणी धुंड करीया..!!
मुक्त लैंगिक  जीवनेमं छोरार ‘ जैविक बाप’ कुण..? Biological Father इ कळेनी करन धुंडणू लागचं. धुंडेमं छोरार गळेमं जो माटी ‘ हासली’ घालीये ऊ ओ छोरार बाप..! येनं समाज शास्त्रेर भाषामं  ” सामाजिक पिता “‘ Social Father ‘ कचं..
‘ हासलो मोलायो सेताबी बणजारा ‘ 

तोडा समाजेमं पितृत्वेन मान्यता मळाये सारु धनुष्य बाण भेट देणू लागचं ये विधीनं ‘ पुरसुतपिमी ‘ कचं…गोरगणेमं येनं धुंड कचं..! 

गण समाजी लोक जीवनेमं वैयक्तिक  मालकी हक्केर भावना रेयेनी एक टोळीरो मनक्या दुसरी टोळीमं भळतोतो कोनी; करन इ मार तांडेरो- तांडरो.इ मार तांडेरी- तांडरी..! ये शब्द रुढ हुये छ.इ मारो मत छ.

” गोरगणेरो आदिम चेहरो वजाळेम लायेवाळ इ एक बोलकी प्रथा छ” 

An  Aboriginal  Face  of Gormatee

संदर्भ- तुकारी..भीमणीपुत्र 

                    भीमणीपुत्र 

                   मोहन गणुजी नायिक
सौजन्य:- गोर कैलास डी राठोड

गोर बंजारा आँनलाईन न्यूज पोर्टल मुंबई महाराष्ट्र राज्य.

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