“गोरमाटी साहित्यिक भिमणीपुत्र बापू के दृष्टिसे गोर साहित्य की उपयुक्ततता Usability क्या है”

भिमणीपुत्र बापू के दृष्टिसे गोर साहित्य की उपयुक्तातता usability क्या है !!

    जब मैने  बापू, भिमणीपुत्र, मोहन गणुजी नाईक ( साहित्यिक, महाराष्ट्र )के किताब पढे,गोर साहित्यके प्रति उनकी बहुमोल संवेदनशील भावनाओं का एहसास हुआ ।

  उनके साहित्य का मुख्य प्रयोजन गोर वैज्ञानिक कसोटीपर खरा उतरनेवाला गोर मानवीय भावना एंवम संवेदना का विस्तार और प्रचार-प्रसार करनाही है। हमारे अंदरकी गोर गणोंके अभिव्यक्ति  की मनोदशा के विस्तार को पुष्टि देनेका काम उनके साहित्यने किया है। । वे एक मूर्धन्य तत्वज्ञ हौनेके नाते उनके  साहित्य अंतर्गत मर्मज्ञ अंगों ने साहित्य के उद्देश्य के संबंध में बहुत सारे सवालों का जवाब बहुत गंभीरता से उठाने का प्रयास किया है। शायद contemporary साहित्यकारों के दृष्टिकोणोंमे यह बहुत कम मात्रा में है। उनका आरंभिक लेखन आदर्शोन्मुखी रहा है लेकिन जैसे-जैसे हमे उनका साक्षात्कार अपने गोरबंजारा गणोंके सांस्कृतिक पैलुसे My Swan songs “वाते मुंगा मोलारी” से आरंभ हुआ, उनकी सर्वागीण मान्यता में बदलाव की कोई सीमा न रही । उन्होंने अपने किताब ,‘ मारोणी, गोरपान ’ में गोर गणों के साहित्य के कडी का प्रयोजन को बहुत ही बारीकी से पकड़ा है। “ वे स्वयं साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील  है। वे कहते है की “मेरी कल्पना में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वच्छंदता (Romanticism) की जिस अवस्था में देखना चाहता हुँ  वह इतनी मात्राओंमे मुझे  दिखाई नहीं देती।” इसलिए वर्तमान मानसिक और सामाजिक अवस्थाओं के पहलुओंसे उनका मन कुढ़ता रहता है।

       जबकी साहित्य के आरंभ में कुछ  विद्वानों ने साहित्य के कुछ प्रयोजन बताए हैं वे सभी भिमणीपुत्र बापू के आगे ये मिथ्या लगता हे। , स्वांत: सुखाय का विचार उन्होंने अपने साहित्यमें बताये usability  प्रयोजनों को आधुनिक गोर  संदर्भों से जोड़कर देखें तो बहुत सारी नई बातों का पता हमे उनके साहित्यसे चलता है।

 परंतु  उनकी गोर रचना की प्रासंगिकता और उपादेयता उन्हे यश देने का कार्योंमे हर कसोटी सीद्ध करता है। किन्तु अपने साहित्य में गोर सामाजिकता को बनाए रखनेका गुण उनके साहित्यकी विशेषता है।  उनका साहित्य व्यापकतासे गोर गणोंके के बीच गण जन-जीवन की वास्तविकताएँ और आकांक्षाएँ सहज सुबोध रूप में विस्तारसे व्यक्त होती हैं। गोर गणोंके साहित्य के रूप के साथ-साथ उसकी अंतर्वस्तु, उस अंतर्वस्तु में मौजूद यथार्थ गोरचेतना और उस यथार्थ चेतना में निहित गोर वैज्ञानिक विश्वदृष्टि उन्होंने अपने साहित्यकी उपयुक्तक्तामें अग्रणी है। 

       हम जानते है, बापू का साहित्य का प्रयोजन ही उसके विस्तार से पूरा होता है, – उनका साहित्य पढ़ने के बाद हमे निश्चित तौर पर यह बात दिखेंगी की,“कला, कला के लिए या साहित्य मात्र साहित्यिक रचना के लिए एक मिथ्या धारणा है। सबकी खैर मांगने वाला साहित्य के प्रयोजन को समझने के लिए वह लिखते हैं- “गोर Romanticism रोमांचकता  साहित्य का इतना ही प्रयोजन है कि वह भावों को तीव्र और आनंदवर्धक बनाने के लिए गोर धाटी की सहायता लेता है।  अपनी परिभाषाओं में अलग-अलग बिन्दुओं से साहित्य के उद्देश्य समझाने का सार्थक प्रयास वे करते हैं। वे आजही वयोवृद्ध होनेके बावजूद गोर गणों संस्कृति की सच्चाई लिखने के लिए प्रयासरत है। उनका साहित्य तभी सफल  है जब वे हम भटके और नासमझ लोगों को सही रास्ता भी दिखाया है। और उनका साहित्य का प्रयोजन समय-समय पर नए संदर्भों से भी जुड़ता दिखता है। बापूके साहित्य का पहला संबंध आत्मास्वरूप गोर गंणोसे है, फिर उसकी शुद्धि से है। यही वजह से उनके साहित्य की उपयुक्त तता प्रयोजन पूरा हुआ है जहाँ गोराबोली और संस्कृति के आविष्कारोके ओतप्रोत ऐसा उनका  ऐतिहासिक साहित्य गोरगणोंमें आधिक्यसे प्रभावशाली बनता रहेंगा । उन्हे चिरकालतक नही भुला जा सकता।

   बापू आपको दी गयी गोर गणोंको Encyclopedia तथा गोर साहित्य का Pioneer की उपाधी के लिए आप सार्थ है । और युगोंतक इसे कोयी हासील करनेंके लायक बनेंगा यह केवल वक्त की नजाकत होगी.. ।

   आप सदाहरित दुर्घायू बने।।

  शुभकामनाओं के साथ —-

                    प्रा.दिनेश एस.राठोड

                         9404372756

सौजन्य:- गोर कैलास डी राठोड 

गोर बंजारा आॅनलाईन न्यूज़ पोर्टल मुंबई महाराष्ट्र राज्य,

मो.9819973477

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