“गोर बंजारा साहित्य सम्मेलनेरो चेहरो इ अस्सलामु गोरवट;वाड;मरीन रूपेरो रेणू”

​वाते मुंगा मोलारी

              My swan song

                        भीमणीपुत्र

गोर बंजारा साहित्य संमेलनेरो चेहरो इ अस्सल गोरवट;वाड;मयीन रुपेरो रेणू..!

            एक अपेक्षा….

“गोरबोली भाषा शास्त्रेरो अभ्यास करतूवणा गोरबोली भाषारो स्वतंत्र स्वरुप शास्त्र अन गोरमाटी संस्कृतीरो वाड;मयीन चेहरो धेनेम लेणू गरजेर रचं.काहा कतो भाषा इ संस्कृतीर वाहक रचं इ जना आपण मानाचा जना ओतं गोरमाटी संस्कृतीरो वाड;मयीन चेहरो नंजरे हुड्यांग लेन गोरबोली भाषारो सोजा लेणू इ अपेक्षित रचं.इ सोजा लेतूवणा गोरमाटी संस्कृतीरे वाहनेरो स्वतंत्र स्वरुप शास्त्र भी मान्य करणो भाग छ.गोरमाटी संस्कृतीरो इ न्यारो वाड;मयीन चेहरो, नंजरे हुड्यांग न लेता गोरबोली भाषानं कुणसी भी भाषारे दामणीती भांदणू इ गोरबोली भाषारे स्वतंत्र स्वरुप शास्त्रेपं अन्याव वेजाये…!

         गोरबोली भाषा व्यवहारे माइर *शब्दालंकार/ आलंकारिक शब्द*ये गोरबोली भाषारे स्वतंत्र अन मालकीर शब्देती सणगारे हुये अदभुत शब्द छ.गोरबोली भाषा व्यवहारे माइर *आलंकारिक शब्द/  शब्दालंकार/अर्थालंकार*ये गोरबोली भाषार स्वतंत्र ओळख सिद्ध करचं.जेर उत्पत्तीरो मूळ घटनात्मक दर्जारी 22 भाषाम धुंडे तो भी लाबेनी…!

             भाषा शास्त्रेमं तत्सम, तद्भव,परभाषीय अन देशी ये शब्दसिद्धीर प्रकार केमेले छ.गोरबोली भाषा व्यवहारे माइर केवळ आलंकारिक शब्दज कोनी तो ये शब्दसिद्धीर परले भी वणान  गोरबोली भाषार मालीर शब्द आज भी भाषा व्यवहारेम जीवते छ.ये गोरबोली भाषा शब्देरो नातो कुणसी भी तर्कसिद्ध पद्धतीती घटनात्मक दर्जारी 22 भाषा माइर शब्देती जुळेनी अन जुळातू भी आयेनी.ये से वाते धेनेम लेताणी गोरबोली भाषारो,गोरमाटीरे वाड;मयीन संस्कृतीरो मूलभुत संशोधन वेणू गरजेर छ…!

         गोरमाटी संस्कृती इ वाड;मयीन संस्कृती छ.*गेयता* इ गोरबोली भाषारो प्रमुख लक्षण छ.अनेक विचारवंत वाड;मयेन *तिसरो डोळा*मानमेले छ.गोरमाटी आतरा भाग्यवान छ क,इ *तिसरो डोळा गोर संस्कृतीरो अविभाज्य अंग छ* ये तिसरे डोळारे माध्यमेती गोरमाटी भिया इ सारी जगेरो पारदर्शक ठरगो छ..*नारे नार दिवो बाळ;नानक मोती फुलो वजाड*..! इ भाव सुचकता येरो सेती मोटो पुरावा ठरचं.*एक बंजारा गाये,हम सभ जिनेवालो को जिने की राह बता ये*..!जेष्ठ साहित्यिकेर इ अनुभूती धेनेमं लेणू लागीये…!

          मौखिक साहित्य इ भाषा शास्त्रेरो एक महत्वेरो खुराक रचं, हानू अभ्यासकेर केणी छ.ये खुराकेरे आधारेपं गोरबोली भाषारो ऐतिहासिक भाषा शास्त्र हूबो वे सकचं.अस्सल गोरबोली भाषारो,दस हाजार वरसेर आंगड्यारो मौखिक साहित्य परंपराती आज भी तांडेम जिवतो छ.गोरबोली भाषा व्यवहारे माइर हद्दपार वेगे जकोण शब्देनं भाषा व्यवहारेम होटो लायेर ताकत फक्त मौखिक साहित्येमज छ.गोरबोली भाषा श्रीमंत,समृद्ध जर करेर विये तो *गोर बंजारा साहित्य संमेलनेरो स्वरुप इ भाषार जत्रारो रेयी चाये**अन ये भाषार जत्रारो केंद्रबिंदू इ तांडो रेयी चाये जनाज गोरबोली भाषा,मौखिक साहित्येनं न्याव मळीये*…!

        गोरमाटी संस्कृती इ वाड;मयीन संस्कृती छ;करन गोर बंजारा साहित्य संमेलनेरो चेहरो इ अस्सल *गोरवट*वाड;मयीन रुपेरो रेयी चाये..!

         केवळ गोरबोली भाषारो समावेश घटनार आठवी अनुसूची- अनुच्छेद 344 (1) अन 351 कलमे अंतर्गत वेणू इ मांगणी करन कपडा झटकन मोकळे वेणू येनं साहित्य संमेलन संपन्न वेगो केतू आयेनी…साहित्य संमेलनेर बाद से समस्यार पाठपुरावार नैतिक जबाबदारीर भान भी आयोजकेनं रेणू गरजेर छ.येर सातोसात सवारेर पिढीमं भाषा संस्कार,गोरबोली भाषारो महत्व, वाड;मयीन अभिरुची प्रगल्भ अन गोडी कू निर्माण करतू आये? इज गोर बंजारा साहित्य संमेलनेर आयोजनेर लारेर प्रामाणिक हेतू रेयी चाये.इ मार उपदेश छेनी तो गोरबोली भाषिक गण समुहे माइरो एक घटक करन म मार अपेक्षा व्यक्त कररो छू…!

          आज तांडेपेडेमं *गणगोर अन तीजेन* जड पाऊलेती मार याडी भेने गीद बोलती ओळ्णीर पदरेर कोसाती झोलो देन निरोप दचं..

*जावो मारी सातण वगेरीया*..

इ गीद बोलन तीजेन निरोप दचं जना आकीमं डब डब आसू रचं..

       आबं ये ऐतिहासिक अन कृषी सिद्धांतेरे ये सोजानं *कोण्या गावाचं आलं पाखरु*? हानू टिंगल टवाळी करन वाट लगायेर प्रथा कायी टवाळखोर रुढ कररे छ..गोरुर संवेदनशीलता आज गमाती जारी छ.

   गोर संस्कृतीरो इ विडंबन कू थांबतू आये ? ये संकल्पेरे अधिष्ठानेपं साहित्य अन सामाजिक चळवळीर वाटचाल रेणू इ अगत्येर छ…!


*गोरबोली भाषार मालकीर स्वतंत्र अलंकारिक शब्द*-


ठालो ठणको-नकाश्रू

डावो धरांऊ-पुष्य नक्षत्राचा पाऊस

डावो डूंगर-वयोवृद्ध म्हातारा

पेड मर्दानी-चिलम

डावो साणो-वयोवृद्ध 

डायी साणी-वयोवृद्धा

साणो सरता- शहाणा श्रोता

पणिरी पनवाळी- पणिचे जलाशय

भिनो गळ्णो-तोंड चोपड्या गोष्टी 


गोर बोलीभाषार स्वतंत्र ओळख सिद्ध करेवाळ आसे ये अलंकारिक शब्द कू जतन करतू आये ? ये से वातेर खल ये सवारेरे *भाषार जत्रामं* (साहित्य संमेलन) वेणू इ अपेक्षा…!

*संदर्भ*-

गोरपान-गोरबोलीतील भाषा सौंदर्य 

       भीमणीपुत्र 

                भीमणीपुत्र 

         मोहन गणुजी नायिक (हारावत)

सौजन्य:- गोर कैलास डी राठोड 

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