“फोकलोर=मूढ (मुर्ख) असंस्कृत लोकूरो ज्ञान इ एक कावेबाज”

“वाते मुंगा मोलारी”

                     भीमणीपुत्र 

” फोकलोर= मूढ, (मूर्ख) असंस्कृत लोकूरो ज्ञान इ एक कावेबाज, धुर्त अभ्यासकेरो पूर्वग्रहदुषित विवेचन ”
” लोक साहित्य ये शब्देरे विवेचनार्थ कायी मान्यवर अभ्यासक ‘ फोकलोर’ ये एंग्लो सेक्शन शब्देर आधार लेन फोकलोर कतो मूढ, असंस्कृत लोकूरो ज्ञान, हानू अर्थ हेतुपूर्वक सिद्ध करमेले छ. 

          समृद्ध लोकसाहित्येर परंपरा जोपासेवाळे लोक गणेर ज्ञान, प्रतिभा,  कल्पकता, लोसाहित्येर अंतरंग, ओनेर संस्कृती ये से वाते धेनेम न लेता केवळ आपणेनं चावं ओसे चमत्कारिक शब्देर आधार लेन लोक साहित्य ये शब्देर विवेचन करणू इ न्यायसंगत वेयेनी.

           लोकसाहिते माइर सौंदर्य, आशयगर्भ, भाषार शब्देर श्रीमंती ओ लोक गणेर प्रतिभा, संस्कृतीर विचारधारा ये से वातेर विचार करनज लोकसाहित्य ये शब्देर विवेचन करणू गरजेर रचं.

           धर्म अन समाज व्यवस्थारे धगधगते आंगारेमं धरसळाये हूये एकांदी लोक गणेनं किंवा जातेनं आपणेनं अनुकूल आसे शब्देर आधारेपं मूढ (मुर्ख), असंस्कृत केणू इ एक कावेबाज, धुर्त आसे अभ्यासकेर पूर्वग्रहदुषित विवेचन छ.

            गोर लोकसाहितेरो प्रामाणिक पणाती अभ्यास किदे वेते तो गोर लोकसाहित्य इ मूढ, असंस्कृत लोकूरो साहित्य न रेता; एके काळेर प्रगत आसे जगजेष्ट सिंधू संस्कृतीती नातो जोडेवाळे आसे सूंस्कृत, प्रगत लोक गणेर इ साहित्य छ इ निर्विवाद सिद्ध  वचं.गोर लोकसाहित्तेनं ‘ फोकलोरेर’ पंगतेमं बसारणू इ अज्ञान पणार लक्षण छ.

            एंग्लो सेक्शन भाषामं फोकलोर ये शब्देर आर्थ मूढ, असंस्कृत लोकूरो ज्ञान हानू वचं. गोर बोलीभाषामं बी लबाड लोकूरो प्रवाह ये आर्थेती फोकलोर इ शब्द सिद्ध वचं. 
” कायी फोक माररो छी भडा; फोकनाड्या कटामेरो” 

” लोर= प्रवाह ये आर्थेती लोर इ शब्द बी गोर लोकसाहित्येमं जाग जाग विकरातू दखावचं.
‘ किमेती आयो वेरी ( वैरी ) खाळ्यार लोर; मारी सातणूनं लेयी चालो’ 
‘ पावो फुटो फकडो हुवोर लोर; फतियानं सरळी वाट’
ये लोक गीदे माइर ‘ लोर’इ शब्द ‘ प्रवाह’ ये आर्थेती सिद्ध वेमेलो छ. 

” मार मतेती लोकूर हितसंबंधेर रक्षण, संवर्धन करेवाळे लोकसिद्ध ज्ञानेर प्रवाहात्मक अभिव्यक्ती कतो लोकसाहित ” इ विवेचन संयुक्तिक ठरचं.

        लोकसाहित्येर निर्मिती करेवाळ लोक ये ज्ञानी, प्रतिभा संपन्नज र, मूढ किंवा असंस्कृत कोनी र.अभिव्यक्ती इ अनुभवसिद्ध ज्ञानेपर आधारित रचं; पुस्तकी पांडित्येपर रेयेनी. केवळ चमत्कारिक शब्देर आधार लेन लोकसाहित्य ये शब्देर विवेचन करेवाळ अभ्यासक जर गोर लोकसाहित्येर अभ्यास किदे वेते तो ‘ लोकसाहित्य कतो मूढ, असंस्कृत लोकूरो ज्ञान’ हानू विवेचन करेर हिम्मत ओनेनं कनाइज कोनी वेयेवाळ रं, आतरी ऊंची इ गोर लोकसाहित्य गाठमेलो छ…!

” जग भुंदणा…

तार याडी गी छ हाट पाठणा

तार याडी लायी काचन कोडी

सरेर आटी लारं फुंदा जोडी

कुणब्या लोकूरी भंदी माडी

तारे बापेरे नशिबेमं सनकाडी

बाळा….सोजो..रे…!”
कुणब्या लोकूरी भंदी माडी; तार बापेरे नशिबेमं सनकाडी…आसे ‘ करुण रसेती’ ठासन भरे हुये अन कोडी, जोडी,माडी, सनकाडी आसे ‘यमक’ शब्दाल॔कारती नटे हुये गोर लोकसाहित्येनं मूढ, रानटी, असंस्कृत लोकूरो ज्ञान भांडार केणू इ कतरा न्यायसंगत छ..? येरो मूलभुत संशोधन वेणू इ गरजेर छ…!

         ” भाषाशास्त्रेर अभ्यासकेन बी भुळी खरायेवाळो गोर बोलीभाषारो रुप सौंदर्य ई सौंदर्य शास्त्रेरे आरश्याम बी नावडेनी ; आतरी ऊ देखणी छ. आज जरी ऊ वाना वानार भाषाभेनेर शब्देर ठिकळी लगायी हुयी फडकी ओढन साहित्येरै दरबारेमं जरी ऊ हुबी विये तो बी ओरो रुपसौंदर्य तल्ली भरो बी करपायो कोनी छ. ..आज बी ऊ ओतरीज देखणी छ जस पेना वेत्ती; ओतरीज ” गोरपान” आज बी छ”…!

संदर्भ- गोरपान गोर बोलीभाषेतील भाषा सौंदर्य. 

               भीमणीपुत्र 

              मोहन गणौजी नायिक

गोर कैलास डी राठोड

गोर बंजारा आँनलाईन न्युज पोर्टल मुंबई महाराष्ट्र राज्य.

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