सायीत्य अन गोरबोली भाषिक गोर गण, – भीमणीपुत्र मोहन नायेक

*वाते मुंगा मोलारी*

My Swan Song
*सायीत्य अन गोरबोली भाषिक गोर गण*..!
“लोक सायीत्येर समृद्ध परंपरा जोपासेवाळो गोरमाटी इ जन्मजात सायीत्यिक छ.गोरमाटी संस्कृती इ जगेर पूटेपरेर एकमेव वाड;मयीन संस्कृती छ.लेखन कला अन मुद्रण कला अस्तित्वेम आयेर आंगड्या सायीत्य ये शब्देसारु ‘वाड;मय’ इ शब्द रूढ र. कलात्मक बोलणो कतो वाड;मय हानू जर वाड;मय ये शब्देर परिभाषा अभ्यासक मानते विये तोपचं बक+ वाना = वाना वानार बोलणेनं वाड;मय केतू आये कायी ? इ स्वतंत्र संशोधनेर विषय छ. *बकवाना* इ गोरबोली शब्द वायफळ बडबड ये आर्थेती गोरबोली भाषा व्यवहारेम रुढ छ.

गोर वाड;मयीन संस्कृतीनं “जात”अपेक्षित छेनी. छेडार कोन्टारो शोषित मनक्या इ गोर लोकसाहित्येरो केंद्रबिंदू छ.भाषावार प्रांत रचनारे धोरणेती,बोलीभाषिक लोक गणेर विचार विनिमयेर ध्वनी साधन आज दुर्लक्षित वेतो जारो छ.दुर्लक्षित रेयेर येती बोलीभाषिक लोक गणेर विचार विनिमयेर ध्वनी साधन मंण्णेरो कडापो भोगरो छ.येरो भान भी आज जागृत वेगो छ;करन बोलीभाषिक लोक गण आज सायीत्य संमेलनेर भाषा करेन लग्गो छ.गोरगण गोरमाटी भी येनं अपवाद छेनी.

आपणेन भी आपणो मुंडो आपणे भाषा सायीत्येम देखेन मळणू, बोलीभाषा जीवत रेणू इ मांगणी जर बोलीभाषिक लोक गण सायीत्य संमेलनेर माध्यमेती करतो विये तो इ मांगणी कायी गैर छेनी.

गोरबोली भाषा इ गोरगणेर मातृभाषा छ.ये *याडीबोलीर* संवर्धन,रक्षण कू करतू आये ? येर दिशा भी निश्चित वेणू गरजेर छ.

गोरबोली भाषा इ उप बोली छ..अपभ्रष्ठ छ..संकरोत्पन्न छ, इ गोर याडीबोलीर विटंबना सामळन रीसेती मूठ्ठी वळ जारी छ.प्रचंड संख्यायूक्त गोरबोली भाषिक लोकगणे माइर गोर शब्द सैनिक अन गोरबोली भाषा प्रेमीर रीस आबं थंबरी कोनी छ.गोर शब्द सैनिक आपणे हातेमं धगधग सळगती शब्दमशाल लेन बंडखोरीर भाषा करेन लग्गो छ.

वाल्मिकेर रीसे माइती महाकाव्य वेपडो हुओ छ.आसे प्रकारेर *तांडा महाकाव्य* गोर शब्द सैनिकेर रीसे माइती वेपडणू इ गरजेर छ. इ अपेक्षा लेन तांडो आज आपण वाट खोवतू हुबो छ.

*पणिरी पनवाळी वीरा आमला चमला मोरगे;कुणसे देसा जोंऊ तारी वाट* इ तांडेर गत वेगी छ.गोर शब्द सैनिकेर इ रीस दुर्वास ऋषीर रीसे नाइ निरर्थक न ठरणू येर सारु गोर बंजारा सायीत्य संमेलनेर आज नितांत गरज छ.येर सवाइ क्रांतीर भाषा थोत ठरेवाळ छ.

*गोरबोलीरो विकास;इ गोरगणेरो विकास*इ भाषा प्रेमीरो आत्मभान आबं जागृत वेगो छ.इ गोरबोली भाषा अन गोर संस्कृतीर उज्वल भविष्येर नांदी छ.

*सायीत्य* ये शब्देर सोजा लेतूवणा गोरबोली भाषा व्यवहारेर  स्वतंत्र स्वरुप शास्त्र नंजरे हुड्यांगं  रेणू आवश्यक छ.

गोरबोली भाषा व्यवहारे माइर एकांदी प्रचलित शब्देमं जर दुसरे क्रमांकेपं *ह* इ व्य॔जन आवचं जना ओतं *ह*इ व्य॔जन अज्ञात वे जावचं अन ओर जागं *य*नतो *व* ये व्यंजन आपण जागा कायम कर लचं.जसो * मोहन-मोवन,मोहना-मोयना,माहूर-मोवर,मेहरगड-मेयरगड, अहमदनगर-  अयेमदनगर, माहेर-मायर*

गोरबोली भाषा व्यवहारेरो इ स्वतंत्र स्वरुप शास्त्र छ.ये स्वतंत्र स्वरुप शास्त्रेरे आधारेपं *साहित्य* ये शब्देरो रुपांतर *सायीत्य*हानू गोरबोली भाषा शब्देमं वेणू इ संभवनीयज कोनी तो शास्त्र संमत भी छ.निरुक्ती अन व्युत्पत्ती ये शब्देर ओळख करन देयेवाळे ये शास्त्रेर पाठबळ भी मार ये विधाने लार छ. प्रत्येक शब्द आपणे सोबत इतिहास,भूगोल अन संस्कृती लेन हुबो रचं हानू जेष्ठ अभ्यासक सुप्रिया महाजनेर केणी छ. *सायीत्य* ये गोरबोली भाषा शब्देलारं भी गोर वाड;मयीन संस्कृती हूबी छ.

गोरमाटी इ सोतासारु कनायीज कायी मांगेनी तो पचं मांगचं तो भी कायी…????
*कोर गोरुनं सायी वेस*

*नंगरी वसतीनं सायी वेस*

*च्यारी पगेनं सायी वेस*

*गोर गरीबेनं सायी वेस*

*किडी मीडीनं सायी वेस*…!
गोरुर इ मानवतावादी मांगणी इ नीतिशास्त्र छ.सेरो हितसंबंध जोपासेवाळ इ गोरबोली भाषा अभिव्यक्ती *सायीत्य* ये शब्देरो रुप सिद्ध करचं.

*सायीत्य इ गोरबोली भाषा अभिव्यक्तीरो एक ध्वनी रुप साधन छ.गोरबोली भाषारो इ सायीत्य इ ध्वनी रुप साधन लिपीबद्ध वेणू आज इ काळेर गरज छ*..!
*भीमणीपुत्र*

*मोहन गणुजी नायिक*

साहित्यक: भिमणीपुत्र मोहन नायेक
साहित्यक: भिमणीपुत्र मोहन नायेक

प्रमुख प्रतिनीधी: रविराज एस.पवार

 

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