होली मनाओ पर पानी बचाओ

होली मनाओ पर पानी बचाओ
        होली भारत में मनाया जानेवाले मह्त्वपूर्ण त्योहारों में से एक हैं। इसे रंगो के त्यौहार के रूप में जाना जाता हैं।इस दिन सभी लोग आपसी बैर भूलाकर ,आपस में गले मिलकर, गुलाल लगाकर बड़े जोर शोर से इस त्यौहार को मानाने की परम्परा रही हैं।होली वास्तव में आपसी भाईचारा और शांति का पैगाम देती हैं। इस दिन सभी अपने चेहरों पर गुलाल लगा लेते हैं। इसका अर्थ होता है हम सब एक सामान हैं। किसीकी कोई अलग पहचान नहीं है। सब एक सामान दिखते हैं ।क्या बड़े क्या बूढ़े सब एक ही रंग में दिखाई देते हैं।आपसी सौहार्द को बनाये रखने के लिए हमारे जीवन में त्योहारों का होना बहुत जरुरी हैं।

जहाँ चारो तरफ रंगो का त्यौहार मनाया जा रहा हैं वही महाराष्ट्र के कई भागो में तो पीने तक का पानी उपलब्ध नहीं हैं।स्कूल के बच्चे पानी के चक्कर में अपनी परीक्षा तक नहीं दे पाते।घर की महिलाएं 5 से 6 घंटे सिर्फ पानी भरने का ही काम करती हैं।पीने का पानी लाने के लिए महिलाओं को 3 से 4 किलोमीटर की दुरी भरी दोपहरी में नंघे पैरो से तय करनी पड़ती हैं।दूर दराज़ इलाको में अमूमन यही हाल हैं।कही-कही तो कुएँ सूख गए हैं। 600 फ़ीट नीचे भी पानी उपलब्ध नहीं हैं।जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। लोग जमीन में गड्डे खोद कर उसमे से पानी निकाल कर उसे कपडे से छान कर पानी पीते हैं। सोलापूर में तो 30 -40 दिनों में एक बार पानी आता हैं। और कही तो 90 दिनों में एक बार पानी आता हैं।फिर भी लोग बिना शिकायत के अपना जीवन-यापन कर रहे हैं।उन्हें अपने हालात से खुद ही लड़ना हैं।

ऐसे में मानवीय आधार पर क्या हमें पानी को व्यर्थ होने देना चाहिए? नहीं हमें जितना हो सके पानी के अनावश्यक उपयोग से परहेज करना चाहिए।हम खुशनसीब हैं की हम ऐसे इलाको में रहते हैं जहा 24 घंटे पानी मिलता हैं। इसका अर्थ ये कतई नहीं हैं की हर जगह इसी प्रकार की सुविधा मिलती हैं।लोग व्यर्थ में ही पानी का दुरूपयोग करते हैं।राज्य सरकारों ने भी तरह-तरह के कार्यक्रमों से लोगो में जागरूकता लाने का प्रयास काफी हद तक किया हैं लेकिन वह कारगर सिद्ध होता नहीं दिख रहा है।

आज के आधुनिक परम्परा के अनुसार जब तक होली में लाखों लीटर पानी बर्बाद न हो जाए तक शुकुन ही कहाँ मिलता हैं।जहाँ देखो वही लोग रंगो की पिचकारी भरे एक दूसरे के ऊपर रंग डालते पानी व्यर्थ करते नजर आते हैं। आजकल तो होली खेलने का तरीका ही बदल गया हैं।कोई आयल पेंट लगता हैं तो कोई अंडे फोड़कर होली मनाता हैं।कही तो नालो में डुबो कर इस त्यौहार को मनाया जाता हैं। ऐसे में कुछ बोलो तो कहते हैं..भाई एक दिन में कितना पानी बचा लोगे?हमारे त्यौहारों में ही आपको कमियां नजर आती है।बड़े आये पानी बचानेवाले। और कुछ नहीं तो आपको धर्म का दुश्मन तक बता देंगे।और धार्मिक भावनाएं आहत करने का इल्जाम सर मढ़ देंगे इसी तरह की सोच से आज ये हालात हो गए हैं की हमें पीना का पानी भी नहीं मिल पा रहा है।

आप को होली खेलने से कोई नहीं मना कर रहा ।आप खेले पर किसी की जरूरतों को ध्यान में रख कर।एक तरफ जहा एक इंसान एक बूँद पानी न मिलने के कारण अपने प्राण त्याग देता हैं वही दूसरी तरफ बड़े ऐशो आराम से पानी की बर्बादी कर रहा हैं।

पानी की बर्बादी कर मनुष्य प्रकृति के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहा हैं। जिसका नुक़सान समस्त मनावजाति को होनेवाला है। 

-लेखक. मुंबई विश्वविद्यालय के गरवारे संस्थान द्वारा संचालित पत्रकारिता पाठ्यक्रम के विद्यार्थी हैं
सौजन्य:  रविराज एस. पवार

              Chief editor

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