​बाबा लखिशाह बंजारा जी की जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं.. 

    लख्खीशाह बंजारा का जन्म 15 अगस्त 1580 को दिल्ली के रायसिना टांडा में हुआ था। पिता का नाम गोधू व दादा का नाम ठाकुरदास बंजारा था। उनके पास दो लाख बीस हजार बैल और बीसियों हजार मालवाहक बैलगाड़ियाँ थीं। उनके एक काफिले में आठ से दस हजार तक बैलगाड़ियाँ होती थीं जिनमें से हरेक पर लगभग तीन क्विंटल माल लदा होता था। मूलतः नमक, अनाज के अलावा ,घोड़ों की काठें या ज़ीन, रकाबें, हौदे, सैन्य रसद का सामान लदा होता था। माल का परिवहन दो तरफा होता था और मुद्राओं के अलावा सामान से सामान का विनिमय होता था। मसलन सागर की प्राचीन नमकमंडी में आज के अफगानी, पाकिस्तानी इलाकों से नमक आता था तो यहाँ की उपज उत्तरी इलाकों में ले जायी जाती थी।
मुगलों ने बंजारों के इन काफिलों को अपने विशाल सैन्य अभियानों और देशभर में फैले किला ,गढ़ियों में रसद पहुँचाने के लिए व्यवस्थित रूप दिया। काफिलों को सुरक्षा प्रदान की। बंजारा व्यापारी खुद योद्धा भी होते थे और अपने सुरक्षा दस्ते भी साथ रखते थे। काफिले में महिलाऐं और बच्चे भी होते थे। उनकी महिलाऐं पर्दों में नहीं रहती थीं बल्कि व्यवसाय में बराबर से हाथ बटाती थीं। काफिले का प्रमुख नायक कहलाता था और लख्खी शाह भी खुद धनी बंजारा नायक था। वह कीमती कपड़े पहनता और उसके गले में सोने, हीरों के हार सजे होते थे।बुंदेलखंड और महाकौशल के इलाकों में लख्खीशाह का काफिला ही कारोबार करता था।
काफिले में चलने वाले लगभग बीस पच्चीस हजार लोगों के लिऐ हर प्रमुख पड़ाव पर लाखा बंजारा ने सराय, कुँए और तालाब बनवाऐ थे। सागर का वर्तमान किला तब सिर्फ एक गढ़ी था जिसे 1760 में मराठा सरदार ने आज का स्वरूप दिया। इसके आसपास जो संरचनाऐं लख्खी शाह ने सागर में बनवाईं थीं उनमें कटरा नमकमंडी का पड़ाव,झरना परकोटा से लेकर मस्जिद के चारों कोनों तक कई कुंए और लाखा बंजारा झील शामिल हैं। जबलपुर के कई तालाबों के समान सागर झील भी सक्रिय ज्वालामुखी के सुप्त होने पर बना प्राकृतिक क्रेटर था जिसमें सहज रूप से आसपास के पहाड़ों पर बरसा पानी जमा हो जाता था। लख्खी शाह ने इसमें और खुदाई कराके चारों तरफ पिचिंग और खूबसूरत घाटों का निर्माण कराया। 
  
झील में पानी नहीं आने पर अपने बच्चे और बहू की कुर्बानी देने की घटना सिर्फ कल्पना नहीं है बल्कि इस घटना में अनुश्रुति का ट्विस्ट देकर स्थानीय पुट डाला गया है। लगभग सौ साल की उम्र पाकर 21 जून 1679 को दिवंगत हुऐ लख्खी शाह के आठ बेटे और एक बेटी थी। उसके कई बेटों ने दसवें गुरू गोविंद सिंह जी की सेवा में लड़ते हुए शहादत पायी। इन सभी का नाम सहित पूरा ब्यौरा सिक्खी इतिहास में दर्ज है। लेकिन सबसे अहम घटना जिसने लख्खी शाह को महापुरूष बना दिया वह नौंवे गुरू श्री तेग बहादुर के शव को शहीदी स्थल से भरी भीड़ के बीच जाकर उठाना था।


दिल्ली के चांदनी चौक में जहाँ आज गुरूद्वारा रकाबगंज है वहाँ औरंगजेब ने गुरू तेगबहादुर जी का शीश कटवाया। लख्खी शाह बंजारे और उनके कई साथियों ने साजिशपूर्वक घटनास्थल पर अफरातफरी मचवाई। कटे हुए शीश को उठा कर गुरू का एक शिष्य भाग निकला। तभी लख्खी शाह ने रूई से लदी सैकड़ों गाड़ियां वहाँ भेज दी। इन्हीं में से एक गाड़ी में गुरू के धड़ को लादा और रूई में छिपा कर अपने घर ले गये। व्यापक पैमाने पर खोजबीन शुरू हुई और अंत्येष्टि का कोई रास्ता नहीं था। लख्खीशाह ने घर के भीतर पूरे विधिविधान से अंत्येष्टि की और तुरंत अपने आलीशान घर में आग लगा दी। सारे कीमती सामानों सहित आलीशान कोठी स्वाहा हो गई। ऐसा करके उन्होंने औरंगज़ेब की मंशा को पूरा नहीं होने दिया जिसमें उसने हुक्म दिया था कि गुरू के शव के चार टुकड़े कर दिल्ली के चार दरवाजों पर लटका दिऐ जाऐं।…गुरू के शव को अपमान से बचाने वाले लख्खी शाह इतिहास में अमर हो गये।उनके परिजनों ने बाद में इसकी भारी कीमत चुकाई। हम सागरवासी उनके बनाऐ तालाब के अलावा उनके बाकी इतिहास से अब तक अछूते ही हैं।
गोर कैलास डी राठोड 

बंजारा समाज विचार मंच ठाणे मुंबई
प्रमुख प्रतिनीधी.

रविराज एस. पवार

8976305533

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