Kailash D Rathod

बंजारा भाईयों से एक बात :यह सर्व विदित है कि पुराने जमाने में बंजारा समाज के पास बहुत पशुधन हुआ करता था. यहाँ तक कि पशुपालन उनके जीवन निर्वाहण का बहुत बड़ा जरिया था॰ पशुपालन के लिए वे जंगल में जाते थे और जंगल के पास रहा करते थे, इसी लिए उन्हे बंजारा नाम से जाना जाने लगा. चूंकि उनके पास प्रचुर मात्रा में पशुधन था उन्होने देवी देवताओं की पूजा या किसी भी धार्मिक अवसर पर बकरा या मुर्गी काटना सरल और किफ़ायती समझा. जंगल में उपलब्ध महुए के फूल से दारू बनाकर शौक के लिए नशा भी करने लगे. इस प्रकार किसी भी धार्मिक अवसर पर मांस भक्षण करना और नशा करना उन्हौने अनुष्ठान का अंग बना लिया था और समय के चलते यह आदत एक प्रथा बन गई.किन्तु हमे खेद है कि हमारे समाज केकुछ भाई आज भी इस प्रथा के पीछे वैज्ञानिक कारण की दुहाई देकर मांसभक्षण और नशा करने के लिए लोगों को और बढ़ावा दे रहे है, जिससे समाज के गरीब वर्ग इन लोगों के बहकावे मे आकर और भी गरीब बनते जा रहे है और पशुसम्पदा का भी भारी नुकसान हो रहा है.किन्तु हम यह भूल रहे हैं कि पुरानेजमाने में हमारा बंजारा समाज मांस भक्षण के साथ-साथ दूध, दही, मक्खन औरघी का भी तो किसी भी अन्य समाज की तुलना में बहुत अधिक सेवन करता था. लेकिन दुर्भाग्य है कि ना तो हम इसेहमारी प्रथा से जोड़ते हैं ना गौरव से ? देखिये बुरी आदतें / प्रथाएँ कैसी अच्छी आदतों / प्रथाओं पर भारीपढ जाती है.बंजारा समाज में फैल रही इस बुराई को रोकने / कम करने के लिए मैं पिछले कही वर्ष से हमारे संयोजक श्री रविराजजी राठोड और मै कैलास डी.राठोड सारे समाज सेवक के साथ मिलकर  लगातार प्रयास कर रहे है, और मुझे खुशी है कि आज हजारों बंजारा भाई मेरे साथ जुड़ गए है . इसलिए मैं आपसे सविनय अनुरोध करना चाहता हूँ कि आप भी हमारे समाज के समझदार लोगों को इस दिशा में समझाये और इन बुराईयों से समाज को बचाने का प्रयास करें॰ मैं हमारे कुलदैवत माँ जगदंबा देवी तथा सेवालाल महाराज से प्रार्थना करता हूँ कि आपके हाथों समाज का भला हो॰ जय सेवालाल॰
   …जुडो अन् जोडो….
सौजन्य :- कैलास डी.राठोड
समाज सेवक गोर बंजारा संघर्ष समिती भारत…

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